गया की बाकी सीटों पर आते रहे तूफान, लेकिन सदर में प्रेम कुमार थामे रहे भगवा लहर की पतवार

बीजेपी विधायक और नीतीश सरकार में मंत्री डॉ. प्रेम कुमार (फाइल फोटो) गया धर्म की नगरी है. यहीं महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्त हुई थ

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बीजेपी विधायक और नीतीश सरकार में मंत्री डॉ. प्रेम कुमार (फाइल फोटो) बीजेपी विधायक और नीतीश सरकार में मंत्री डॉ. प्रेम कुमार (फाइल फोटो)

गया धर्म की नगरी है. यहीं महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्त हुई थी तो पौराणिक मान्यता है कि यहां पिंड दान करने से पूर्वज सीधे बैकुंठ जाते हैं. यहां की फेमस तिलकुट मिठाई लोगों के मुंह में मिठास घोलती रही है तो कभी नक्सल आंदोलन की आग में जला जिला लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी करता रहा. पत्नी के वियोग में पहाड़ का सीना चीरने वाले दशरथ मांझी भी इसी जिले में पैदा हुए थे. राजनैतिक समीकरणों को देखें तो यहां की 10 विधानसभा सीटों में 9 पर अलग-अलग दलों के विधायक बनते रहे लेकिन गया सदर पर लगातार 7 बार से भगवा ही लहरा रहा है. बीजेपी के डॉक्टर प्रेम कुमार को घेरने की लगातार कोशिशें हुईं लेकिन वह हर चक्रव्यूह को भेदने में कामयाब रहे. फिलहाल वह नीतीश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं.

गया सदर सीट के समीकरण ऐसे हैं जो प्रेम कुमार के लिए मुफीद साबित होते हैं. वह कुम्हार जाति से आते हैं और यहां पर इस जाति के वोटरों की संख्या ज्यादा है. उनकी स्वच्छ छवि भी उनके काम आती है. उनके खिलाफ जिन लोगों को उतारा गया उनका दागदार इतिहास भी प्रेमकुमार के लिए प्लस प्वाइंट साबित होता है. एनडीए की सरकार में उन्हें लगातार मंत्रिपद मिलता रहा है जिसका मनोवैज्ञानिक लाभ मिलना स्वाभाविक होता है. हालांकि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि डॉक्टर प्रेम कुमार को भले ही यहां से लागातार जीत मिलती रही लेकिन गया के लिए जो किया जाना चाहिए वह नहीं कर पाए. वरिष्ठ पत्रकार राहुल कुमार कहते हैं कि ‘प्रेम कुमार शहरी विकास मंत्री भी रहे हैं लेकिन गया की हालत नहीं सुधरी जबकि यहां पर इंटरनेशनल पर्यटक भी आते हैं. यहां बुनियादी सुविधाओँ के बेहद अभाव है. एनडीए का वोटबैंक हमेशा प्रेम कुमार के साथ रहा इसलिए वह जीतते रहे हैं’.

2015 के चुनाव में उनके खिलाफ मैदान में थे कांग्रेस के प्रियरंजन. कहा जा रहा था कि वह प्रेम कुमार को कड़ी टक्कर देंगे. मतगणना  के दौरान भी अफवाह फैलाई गई कि प्रियरंजन जीत गए हैं. लेकिन आखिर में प्रेम कुमार ने उन्हें 20000 से ज्यादा मतों से हरा दिया. इससे पहले 2005 में उनके खिलाफ जाने माने साहित्यकार और रंगकर्मी संजय सहाय को मैदान में उतारा गया था. लेकिन वह भी प्रेमकुमार का विजयरथ नहीं रोक पाए थे. वरिष्ठ पत्रकार राहुल कहते हैं कि भले ही लोग आरोप लगाएं कि प्रेम कुमार ने गया के लिए बहुत बड़े काम न किए हों लेकिन उनकी साफ सुधरी छवि, पार्टी में उनकी पकड़, जातिगत समीकण और समर्पित समर्थकों की वजह से वह हर बार बाजी पलट देते हैं. भले ही उन्हें जमीनी नेता माना जाता है लेकिन उन्हें सुर्खियों में रहना आता है. 2019  के लोकसभा चुनाव में वह साइकिल से वोट देने चले गए थे और प्रदेश ही नहीं देश की मीडिया का भी ध्यान खींच लिया था.

अगर धार्मिक स्थल के लिहाज से देखें तो मां मंगलागिरी, पितृ पक्ष मेला महासंगम, विष्षुपद मंदिर, फल्गु नदी, सीताकुंड, बोध गया, अक्षय वट, ब्रह्म योनि पहाड़, सुर्यकुंड और कई पौराणिक गाथाओं वाला शहर है गया. यहां देशी विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है लेकिन अतिक्रमण और अवैध निर्माण शहर की पहचान बन चुका है.

वोटर्स की संख्या को देखें तो यहां पर वैश्य समुदाय करीब 50 हजार, मुस्लिम करीब 50 हजार, भूमिहार करीब 25 हजार, राजपूत करीब 25 हजार, कायस्थ और चंद्रवंशी समाज 25-25 हजार, अतिपिछड़ा करीब 30 हजार और पिछड़ी जातियों के करीब 25 हजार वोट हैं.

गया जिले में 10 विधानसभा सीटें आती हैं. शेरघाटी,  बाराचट्टी, बोधगया, गया टाउन, बेलागंज, वजीरगंज, गुरुआ, टेकारी, इमामगंज, अतरी. इमामगंज वही सीट है जहां से पिछली बार हम पार्टी के मुखिया जीतन राम माझी मैदान में उतरे थे और 5 बार से विधायक चुने जा रहे जद यू के उदय नारायण चौधरी को धूल चटा दी थी.

शेरघाटी- यहां पर यादवों वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा है. इसके बाद मुसलमान आते हैं. दलितों में भुइयां और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की संख्या भी चुनावों को प्रभावित करती है. यहां कभी आरजेडी का दबदबा रहता था लेकिन पिछले दो चुनावों से जेडीयू काबिज है.

बाराचट्टी- यह ऐसी सीट है जहां पर नक्सलियों का अब तक प्रभाव माना जाता है. 1990 से लेकर अबतक यहां पर जनता दल, आरजेडी और जेडीयू का दबदबा रहा. 2005 में यहां से जीतनराम मांझी चुनाव जीत चुके हैं.

इमामगंज- 2015 के चुनाव में जीतन राम मांझी ने हम पार्टी से ताल ठोंकी थी और विधानसभा स्पीकर और जेडीयू के प्रत्याशी उदयनाराय़ण चौधरी को हराकर सनसनी पैदा कर दी थी. इस बार जीतनराम मांझी का समझोता जेडीयू से हो चुका है. यह कोईरी, भूइयां, मुसमान और यादवों का इलाका है. जेडीयू के उदयनारायण चौधरी यहां से 5 बार विधायक रहे हैं.

बोधगया – 1990 से लेकर 2015 तक के चुनाव पर नजर डालें तो यहां से किसी भी पार्टी का दबदबा नहीं रहा है. आरजेडी और एनडीए के प्रत्याशी यहां से हारते जीतते रहे हैं. कभी कभार वामपंथी दलों के प्रत्याशी भी जीतने में कामयाब रहे हैं.

बेलागंज- 1990 से लेकर 2015 तक के विधानसभा चुनाव में सुरेंद्र प्रसाद यादव आरजेडी और जनता दल के टिकट पर सात बार जीत हासिल कर चुके हैं. उनकी गिनती आरजेडी के दबंग नेताओं में होती है. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जहानाबाद से मैदान में उतरे थे लेकिन जेडीयू से हार गए. जानकार बताते हैं कि इस बार वह अपने बेटे को प्रत्याशी बनाना चाहते हैं.

वजीरगंज-वजीरगंज सीट पर कभी बीजेपी का कब्जा हुआ करता था लेकिन 2015 के चुनाव में कांग्रेस के अवधेश कुमार सिंह ने बीजेपी के विरेंद्र सिंह को हराकर सीट हथिया ली.

गुरुआ – नक्सल प्रभावति इस इलाके में तीस फीसदी से ज्यादा अनूसूचित जाति की आबादी है. 2010 और 2015 में इस सीट पर बीजेपी को सफलता मिली. इसके पहले दो बार आरजेडी के शकील अहमद खां यहां से जीते थे.

टेकारी– कभी स्टेट (यानि राजवाड़ा) हुआ करता था. यहां का तिलकुट (एक तरह की मिठाई जो जाड़े के मौसम में ज्यादा बनती है) मशहूर है. 2005 से इस सीट पर जेडीयू काबिज है. जबकि 1995 और 2000 में इस सीट से आरजेडी के प्रत्याशी जीते. कोइरी-कुर्मी, यादव और भूमिहार जाति के वोटर ज्यादा हैं.

अतरी- यादव बाहुल्य इलाका है. 2010 के चुनाव में यहां से जेडीयू के प्रत्याशी जीते थे. 2015 के चुनाव में आरजेडी की कुंती देवी को जीत मिली थी. वो 2005 में दोबारा हुए विधानसभा चुनाव में भी जीती थीं उनके पति राजेंद्र प्रसाद यादव जनता दल और आरजेडी के टिकट पर 1995 से 2005 तक विधायक रह चुके हैं. फिलहाल वो जेल में हैं.

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