नौकरी छोड़ राजनीति में आए जीतन राम मांझी ने कई बार बदला है पाला

फूटी स्लेट पर ककहरा सीखकर स्नातक तक की डिग्री पाने का दावा करनेवाले पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने चुना

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jitan ram manjhi

फूटी स्लेट पर ककहरा सीखकर स्नातक तक की डिग्री पाने का दावा करनेवाले पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने चुनाव के ठीक पहले अपना बदल लेने की घोषणा कर दी है। इसको लेकर वे चर्चा में हैं। इस बार वह राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन को छोड़कर एनडीए की नाव पर सवार होने को लेकर चर्चा में हैं। वर्ष 2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान सूबे में जेडीयू की करारी हार पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कुर्सी छोड़ने के बाद राज्य सरकार के मुखिया का ओहदा पाने वाले जीतन राम मांझी सियासत में सिद्धांत से ज्यादा समय को अहमियत देते रहे हैं।

कांग्रेस के साथ हुई थी राजनीति की शुरुआत
कांग्रेस के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाले मांझी कई बार पाला बदल चुके हैं। वर्ष 1990 में कांग्रेस के अवसान को भांप कर वह जनता दल में शामिल हो गए थे। छह साल बाद ही वह राजद में शामिल हुए। 2005 में जब जदयू के दिन फिरे तो वह जदयू के साथ आ गए। 2015 के सत्ता संघर्ष में नीतीश कुमार से मात खाने के बाद उन्होंने हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा नामक अपनी पार्टी बना ली। महागठबंधन में शामिल होने के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तो कोई कामयाबी नहीं मिली, अलबत्ता राजद की मदद से अपने बेटे संतोष सुमन को एमएलसी बनवाने में कामयाब हो गए। अब चुनावों के ऐन पहले मांझी एनडीए में शामिल हुए हैं।

1980 में फतेहपुर से जीते थे चुनाव
वर्ष 1980 में कांग्रेस की टिकट पर फतेहपुर क्षेत्र से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे मांझी चंद्रशेखर सिंह की सरकार में तुरंत मंत्री बन गए थे। मुख्यमंत्री बनने से पहले बिंदेश्वरी दुबे, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, जगन्नाथ मिश्र, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रीत्व काल में भी बतौर मंत्री काम किया है।

गया जिले के खिजरसराय प्रखंड के महकार गांव में खेत मजदूर रामजीत राम मांझी और सुकरी देवी के घर 6 अक्तूबर 1944 को जन्मे मांझी ने जब होश संभाला तो उन्होंने गांव के ही एक भूपति के घर में खुद को चाकरी करते पाया। एक मुलाकात में मांझी ने कहा था कि एक गुरुजी जब जमींदार के बच्चे को पढ़ाने आते थे तो वह भी उत्सुक्तावश उन चीजों को ध्यान से सुनते थे जो बच्चों को बताया जाता था। पढ़ाई में रुचि देखकर उन्हें जमींदार के बच्चों ने फूटी स्लैट दे दी, ताकि वह लिख पढ़ सकें।

भाई के पुलिस अधिकारी बनने पर छोड़ दी थी नौकरी
इसी तरह उन्होंने ग्रेजुएशन किया और फिर टेलीफोन विभाग में नौकरी कर ली। एक दशक तक नौकरी करने के बाद जब छोटा भाई पुलिस अधिकारी बना तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी और सीधे विधानसभा चुनाव में कूद गए। जीते और मंत्री भी बने। तब से उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। इस दौरान फतेहपुर के अलावा बाराचट्टी, बोधगया, मखदुमपुर और इमामगंज से भी चुनाव लड़े और जीते। अलबत्ता गया सीट से सांसद के रूप में निर्वाचित होने का उनका सपना अबतक पूरा नहीं हो सका।

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