बिहारः BJP के कंधों पर सवार होकर नैया पार लगाने की जुगत में नीतीश कुमार

पीएम मोदी के साथ साझा रैली के दौरान नीतीश कुमार बिहार चुनाव में अब हर दिन सियासी पारा लंबी-लंबी छलांग लगा रहा है. विधानसभा चुनाव में इस बार

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पीएम मोदी के साथ साझा रैली के दौरान नीतीश कुमार (पीटीआई)पीएम मोदी के साथ साझा रैली के दौरान नीतीश कुमार

बिहार चुनाव में अब हर दिन सियासी पारा लंबी-लंबी छलांग लगा रहा है. विधानसभा चुनाव में इस बार मुकाबला एनडीए और आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन के बीच है. एक तरफ नीतीश तो दूसरी ओर तेजस्वी मुख्यमंत्री का चेहरा हैं. 15 साल में ऐसा पहली बार है, जब नीतीश कुमार को लेकर बिहार में लोग खुलकर उनके खिलाफ नाराजगी व्यक्त करने लगे हैं.

सच में पिछले 15 साल में पहली बार नीतीश कुमार असहज नजर आ रहे हैं. बिहार के सुशासन बाबू यानी नीतीश कुमार की पुरानी छवि पर ना सिर्फ विपक्ष बल्कि आम जनता भी सवाल उठा रही हैं. बिहार 2005 से इस चुनाव तक नीतीश कुमार चाहें बीजेपी के साथ एनडीए में रहे हों या आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन में, वो हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रहे हैं.

2015 के बाद गिरती गई छवि
एक समय था जब बीजेपी ने नीतीश कुमार के कंधे पर सवार होकर 2005 और 2010 विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की थी. लेकिन इस चुनाव में स्थिति बिल्कुल विपरीत है और नीतीश कुमार को चुनाव जीतने के लिए बीजेपी के कंधे जरूरत ज्यादा है.

आज नीतीश कुमार को बीजेपी के कंधे पर सवार होकर अपनी जीत सुनिश्चित करने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि ना सिर्फ विपक्ष ने बल्कि जनता में नीतीश कुमार के खिलाफ गुस्से को भांपते हुए एनडीए के घटक दल एलजेपी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने भी नीतीश कुमार की सुशासन बाबू वाली छवि पर एक नहीं कई बार सवाल उठाकर एक नाकाम मुख्यमंत्री का तमगा दे दिया.

नीतीश कुमार की सुशासन बाबू की छवि 2015 में आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन सरकार बनते ही धूमिल होना शुरू हो गई थी. उसके बाद अगस्त 2017 में एक बार फिर आरजेडी से परेशान होकर एनडीए में वापसी के साथ उन्होंने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई. लेकिन उसके बाद मुजफ़्फ़रपुर की होमशेल्टर की घटना ने नीतीश कुमार को कठघरे में खड़ा कर दिया. उसके बाद लगातार नीतीश की सुशासन बाबू की छवि धूमिल होती चली गई.

जब देश जहां कोरोना से शुरुआती लड़ाई लड़ रहा था वहीं बिहार में नीतीश के नेतृत्व में कोविड की जंग कमजोर साबित हो रही थी. टेस्टिंग से लेकर अस्पतालों की व्यवस्था तक नीतीश कुमार के प्रति लोगों ने खुलकर नाराजगी जताना शुरू कर दिया. इससे नीतीश विपक्ष के निशाने पर आ गए. सवाल उठने लगे कि नीतीश सरकार ने समय रहते फैसले नहीं लिए इसलिए बिहार में कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं की सच्चाई सामने आ गई.

चिराग पासवान बढ़ा रहे मुश्किलें
अभी कोरोना वायरस के संक्रमण से निजात भी नहीं मिला था कि उसी दौर में करीब 30 लाख मजदूर देशभर से बिहार लौट आए. इसके बाद चुनाव से पहले प्रवासी मजदूर और नौजवानों के लिए बिहार प्रदेश में ही रोजगार एक बड़ा मुद्दा बन गया जिसे विपक्ष ने हाथों हाथ ले लिया.

महामारी से डरे-सहमे नौजवानों में नीट की परीक्षा को लेकर भी नीतीश के खिलाफ नाराजगी देखने को मिली और नीट के पेपर को रद्द करने के बिहार सरकार से सुप्रीम कोर्ट जाने के दबाव बनाया तो चिराग पासवान ने मौका देखकर नीतीश कुमार के खिलाफ माहौल बनाने में कोई भी कोई कसर नहीं छोड़ी. साथ ही बाढ़ ने भी हर साल की तरह अपना कहर दिखाया. इन सब मुद्दों ने सुशासन बाबू की छवि पर ऐसा बट्टा लगाया जो अभी तक नहीं लगा था और अब उनके खिलाफ जनता में नाराजगी बढ़ती ही जा रही है.

बीजेपी के लिए बंगाल से पहले बिहार
सूत्रों की मानें तो सियासी तौर पर नीतीश कुमार की जेडीयू को तेजस्वी से ज्यादा नुकसान चिराग पासवान कर रहे हैं. उसका कारण है कि चिराग पासवान ने नीतीश कुमार को नुकसान पहुंचाने की रणनीति के तहत बीजेपी और जेडीयू से आए ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार, कायस्थ, कुर्मी और कुशवाहा को ज्यादातर टिकट दिया जो बीजेपी और जेडीयू के वोट बैंक में सेंध मार कर आरजेडी की जीत का रास्ता साफ कर दिया. इतना ही नहीं चिराग पासवान ने आरजेडी के मुस्लिम और यादव वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए इक्का और दुक्का यादव और मुस्लिम को टिकट दिया जिससे आरजेडी को ग्राउंड पर नुक़सान कम हो.

मतलब साफ है कि इस बार नीतीश कुमार के लिए चुनाव इतना आसान नहीं जितना दिख रहा है. अब देखना यह है कि नीतीश कुमार के खिलाफ जो एंटी इनकंबेंसी है उसे बीजेपी किस तरह से दूर कर नीतीश कुमार की नैया को पार लगा पाती है. बीजेपी के लिए भी चुनाव अहम है. पीएम नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के सभी नेता यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि यहां हार का सामना करना पड़ा तो बंगाल की राह और मुश्किल हो जाएगी.

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