हाथरस पर बीजेपी को घेर रही थी RJD, दलित नेता की हत्या पर ‘फंसे’ तेजस्वी

तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलित बेटी से हुए गैंगरेप को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है. बिहार महागठबंधन

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तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादवतेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव

उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलित बेटी से हुए गैंगरेप को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है. बिहार महागठबंधन के प्रमुख दल आरजेडी और कांग्रेस हाथरस मुद्दे को लेकर एनडीए के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. दूसरी तरफ बिहार चुनाव से ठीक पहले आरजेडी के पूर्व नेता शक्ति मलिक की हत्या को लेकर पार्टी की मुश्किलें बढ़ गई हैं. इस मामले में तेजस्वी यादव और उनके भाई तेज प्रताप यादव के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, जिसे लेकर सियासत तेज हो गई है.

महादलित समाज से आने वाले 37 साल के शक्ति मलिक की पूर्णिया जिले में गोली मारकर हत्या कर दी गई है. तेजस्वी और तेज प्रताप के अलावा आरजेडी दलित सेल के अध्यक्ष अनिल कुमार साधू, अररिया जिले के पार्टी नेता कालू पासवान, सुनीता देवी और एक अन्य व्यक्ति का भी नाम एफआईआर में है. मलिक की पत्नी की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई है, जिसमें उन्होंने कहा है कि उनके पति की हत्या राजनीतिक कारणों की वजह से हुई है.

तेजस्वी पर लगाए थे गंभीर आरोप
बता दें कि शक्ति मलिक ने कुछ दिन पहले ही एक वीडियो जारी कर कहा था कि टिकट के लिए उनसे चंदा मांगा गया था. मलिक के मुताबिक, ‘तेजस्वी ने मुझसे कहा था कि चंदा तो आपको देना ही पड़ेगा. तेजस्वी ने कहा था कि अगर तुम्हारे पास पैसा है तो टिकट लेकर चुनाव लड़ो, वरना यहां से निकलो. अगर तुम आवाज़ उठाने का काम करोगे तो तुम्हें जान से मरवा दिया जाएगा.’

वीडियो वायरल होने के बाद आरजेडी ने मलिक को पार्टी से निष्कासित कर दिया था. मलिक आरजेडी के दलित सेल की बिहार इकाई के सचिव पद पर थे. मलिक ने आरोप लगाया था कि तेजस्वी यादव ने चंदे के रूप में 50 लाख रुपये मांगे थे. मलिक रानीगंज सीट से चुनाव मैदान में उतरना चाहते थे. मलिक की पत्नी ने कहा है कि तीन लोगों ने उनके घर में घुस कर उनके पति को गोली मार दी और भाग गए.

एनडीए ने आरजेडी के खिलाफ खोला मोर्चा
इसे लेकर एनडीए ने तेजस्वी यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिससे आरजेडी का दलित राजनीतिक समीकरण गड़बड़ा सकता है. जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा है कि आरजेडी में टिकटों की खरीद-फरोख्त होती रही है. उन्होंने कहा कि लालू यादव पर भी पैसे लेने के आरोप लगे हैं. इस घटना से तेजस्वी यादव का दलितों के प्रति क्या दृष्टिकोण है, यह पता चलता है. हालांकि यह भी कहा कि यह पुलिस का काम है और पुलिस मामले की जांच कर रही है. साथ ही बीजेपी नेता अजीत चौधरी ने कहा कि आरजेडी के शासनकाल में भी दलितों, वंचितों की हत्या होती रही थी. आरजेडी के लोगों की कार्यप्रणाली अभी भी नहीं बदली है. हालांकि, आरजेडी इसे एक राजनीतिक साजिश बता रही है.

आरजेडी ने बताया साजिश
आरजेडी के प्रदेश प्रवक्ता चितरंजन गगन ने कहा कि बिहार की जनता इस बार के विधानसभा चुनाव में साजिश करने वालों को माकूल जवाब देगी. तेजस्वी यादव की लोकप्रियता को देख जेडीयू नेताओं की बेचैनी बढ़ गयी है. आरजेडी की छवि को प्रभावित करने के लिए जेडीयू के द्वारा तरह-तरह की साजिश और दुष्प्रचार का सहारा लिया जा रहा है. दलित और अति पिछड़ों के सवाल पर आरजेडी को किसी से सर्टिफिकेट लेने की आवश्यकता नहीं है. बिहार की जनता देख चुकी है कि किस प्रकार एक दलित को मुख्यमंत्री पद से हटाने की साजिश रची गयी थी.

बता दें कि बिहार में दलित 16 फीसदी दलित मतदाता हैं, जो 22 जातियों में बंटा हुआ है. सारे दलित वोट को मिला दें तो कमोबेश यादव वोट बैंक से कम ताकत नहीं रखता है. दलित कोटे के वोट का 70 फीसदी हिस्सा रविदास, मुसहर और पासवान जाति का है. ऐसे में सूबे में दलित वोट बैंक सत्ता की दिशा और दशा दोनों तय करने की ताकत रखता है.

बिहार में दलित सीटों का समीकरण
बिहार विधानसभा में कुल आरक्षित सीटें 38 हैं. 2015 में आरजेडी ने सबसे ज्यादा 14 दलित सीटों पर जीत दर्ज की थी. जबकि, जेडीयू को 10, कांग्रेस को 5, बीजेपी को 5 और बाकी चार सीटें अन्य को मिली थी. इसमें 13 सीटें रविदास समुदाय के नेता जीते थे जबकि 11 पर पासवान समुदाय से आने वाले नेताओं ने कब्जा जमाया था. 2005 में JDU को 15 सीटें मिली थीं और 2010 में 19 सीटें जीती थी. बीजेपी के खाते में 2005 में 12 सीटें आईं थीं और 2010 में 18 सीटें जीती थी. आरजेडी को 2005 में 6 सीटें मिली थीं जो 2010 में घटकर एक रह गई थी. 2005 में 2 सीट जीतने वाली एलजेपी ने तो 2010 में इन सीटों पर खाता तक नहीं खोला और कांग्रेस का भी यही हाल था.

बता दें कि हाथरस कांड को लेकर आरजेडी ने बिहार बीजेपी और जेडीयू के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था. वहीं, अब शक्ति मलिक की हत्या में तेजस्वी-तेज प्रताप के नाम आने के बाद बीजेपी-जेडीयू आरजेडी को दलित के मुद्दे पर घेरने में जुट गई हैं. ऐसे में 2015 में सबसे ज्यादा दलित सीटें जीतने वाली आरजेडी का समीकरण कहीं गड़बड़ा न जाए, क्योंकि दलित मतदाता काफी अहम और निर्णायक भूमिका में है.

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