विशेषांकः मैं बस 13 साल का था, अचानक जीतने लगा…

किसी भी खेल में विश्व चैंपियन बनने के लिए स्पर्धा करना सबसे बड़ी चुनौती होती है. यह चुनौती शतरंज के दुर्लभ खेल में और बड़ी है, खासकर चौंसठ खाने के ल

How to Be Committed to Your Goals Even During Hard Times
Purpose And Profit: 4 Keys To Creating A Profitable Mission-Driven Business
दिल्ली में सबसे सस्ती बिकेंगी इलेक्ट्रिक गाड़ियां, केजरीवाल सरकार देगी 1.5 लाख रुपये तक की छूट

सधी चाल 2015 में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में आनंद

किसी भी खेल में विश्व चैंपियन बनने के लिए स्पर्धा करना सबसे बड़ी चुनौती होती है. यह चुनौती शतरंज के दुर्लभ खेल में और बड़ी है, खासकर चौंसठ खाने के लिए खेल में किसी भारतीय का सम्राट बन कर उभरना और शतरंज का चैंपियन बनना निश्चित रूप से रूप से बड़ी बात है.

विश्वनाथन आनंद का साबका पहली दफा शतरंज की बिसात के साथ तब हुआ, जब वे महज छह साल के थे और उस राह पर धीरे-धीरे कदम रखना शुरू ही किया था जो उनके तेज दिमाग में चल रही शतरंजी चालों की लंबी यात्रा साबित हुई. वे याद करते हैं, ”तब मैं 13 साल का था, तो स्कूली परीक्षाओं के बाद मेरे लिए वह एक नई जमीन हासिल करने जैसा साल रहा. गरमी की छुट्टियों में, शतरंज खेलते हुए मैंने हर गेम जीता.” वे कहते हैं, ”मैं अच्छा खेल रहा था और टूर्नामेंट जीत रहा था. इसलिए 1983 मेरे लिए गजब का साल रहा. अब तक मैंने जितनी मेहनत धीरज के साथ की थी, उस सबका फल मिल रहा था. मुझे नहीं पता कि कैसे और कब, लेकिन ऐसा हुआ. कभी-कभी हमें इन पलों का इंतजार करना होता है.”

आनंद ने 1987 में विश्व जूनियर चैंपियनशिप जीत ली और उसके अगले साल वे ग्रैंडमास्टर के खिताब के लायक हुए और उन्हें यह प्रतिष्ठित खिताब मिला. 1988 में यह खिताब हासिल करने वाले वे पहले भारतीय थे. वे कहते हैं, ”बड़ा अद्भुत समय था, कुछ मायनों में मेरे करियर का सबसे शानदार और सबसे खूबसूरत वक्त भी. प्रतियोगिताओं के लिहाज से उसने मेरे लिए अवसरों के दरवाजों खोल दिए और प्रायोजक मुझे अच्छी कीमत देने लगे. मैं सुविधाजनक तरीके से यात्रा करने लगा और अच्छी स्थिति में खेल सकता था.”

1996 में विवाह के बाद अरुणा भी उनके साथ आ जुड़ीं, जिसे वे एक अहम निर्णायक मोड़ मानते हैं जिसने उनके शतरंज के करियर और जीवन दोनों में बड़ा बदलाव ला दिया. हर चीज को सीखने के मौके के रूप में लेने वाले आनंद इसकी व्याख्या कुछ इस तरह कहते हैं, ”हमने अपने काम बांट लिए और टीम की तरह काम करने लगे. इसने मेरा जीवन और निश्चित रूप से मेरे करियर को भी बदल दिया.” वे याद करते हैं, ”मेरी पहली बड़ी नाकामी जुलाई 2001 में डॉर्टमंड (द डॉर्टमंडर साटाज, जिसमें आनंद आखिरी पोजिशन पर रहे थे) में हुई थी, जिसने मुझ पर कई वर्षों तक गहरा असर छोड़ा था. मेरी शुरुआत बुरी रही थी और फिर अंत आते-आते सब गड़बड़ हो गया—और यह मेरे शतरंज के करियर में सबसे बुरा नतीजा था. लेकिन इसने मुझे खुद को सही करने का मौका दिया.”

आनंद अपनी त्रुटियों को व्यवस्थित रूप से सुधारने में लग गए. वे कहते हैं, ”उससे मैंने सीखा कि समस्याओं पर तब काम करना शुरू कर देना चाहिए, इससे पहले कि वे नियंत्रण से बाहर हो जाएं. उसके बाद से मैं अपने शतरंज में चिंताजनक संकेतों के आने को लेकर काफी सावधान रहने लगा. मैं उन्हें समझने और जल्द से जल्द उनको ठीक करने की कोशिश करने लगा. मैं इस बारे में भी सोचने लगा कि मुझे टूर्नामेंट के लिए कैसे तैयार होना और काम करना चाहिए, लेकिन ये तकनीकी ब्यौरे भर नहीं थे बल्कि नजरिए की तैयारी जैसा था. यह एक बेहद महत्वपूर्ण सीख थी, चाहे वह नकारात्मक नतीजे से हासिल हुई थी. अपने वक्त में, यह मेरे शतरंज करियर का सबसे बुरा परिणाम था.” बेशक, सर्वश्रेष्ठ बनने की उनकी चाहत आज भी उसी उत्साह से जारी है.

दूसरों को पीछे छोड़ने और शीर्ष पर पहुंचने के क्रम में, वह भी शतरंज में शामिल दिमागी दांव-पेचों के साथ, असाधारण तजुर्बे हासिल होते हैं. इसमें आनंद और उनकी पीढ़ी के कई खिलाडिय़ों के लिए दो अंतरराष्ट्रीय शतरंज संघों के बीच का टकराव भी शामिल था, जो कई वर्षों तक जारी रहा.

बढ़ती अनिश्चितता के बीच, आनंद के पास विश्व चैंपियनशिप में दांव लगाने के लिए परिस्थितियों के सुधरने का इंतजार करने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं था. अपनी मानसिक चुनौतियों और तैयारियों के बार में आनंद कहते हैं, ”और तभी जब आप समझते हैं कि अलग-अलग जाने वाले रास्ते कभी नहीं मिलेंगे, शतरंज की दुनिया एक हो जाती है (2006) और तब एक मैच हुआ था जिसे (व्लादीमिर) क्रैमनिक ने जीत लिया. अगले साल, हमें मेक्सिको में ऐसा टूर्नामेंट खेलने का मौका दिया गया, जिसे विश्व चैंपियन में बदल दिया गया.

यह सब बिना किसी सूचना के अचानक ही हुआ. हमें इसकी तैयारी के लिए पांच या छह महीने का वक्त मिला था. आप सोच सकते हैं कि आपको तैयार होने के लिए तो पूरे पांच साल मिले थे. लेकिन असली बात यह है कि अगर सामने कुछ न दिख रहा हो तो आप उसके बारे में सही तरीके से सोच भी नहीं सकते. हम जानते थे कि अब तो आर होगा या पार. मेरे रिजल्ट बहुत अच्छे आए. लेकिन अब हम निरंतरता को नहीं देख रहे थे.”

आनंद कहते हैं, ”विश्व चैंपियन बनने के लिए आपको इस टूर्नामेंट में अच्छा प्रदर्शन भर करना था. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाकी के साल में आप विश्व में अव्वल नंबर पर रहे या नहीं. दूसरी तरफ, मुझे लगता है कि मैंने सब कुछ सटीक तरीके से किया. बेशक, गलतियां हमेशा होती हैं. मोटे नजरिए से, मुझे लगता है कि वह मेरे शतरंज के करियर का सबसे महत्वपूर्ण लम्हा था. मैंने 2000 में एफआइडीई (फिडे) विश्व खिताब जीता, लेकिन वह विवादित रहा. यह दौर दो फेडरेशन के बीच का था. मेक्सिको 2007 बड़ी चीज रही. किसी तरह, यह चल गया.

आप हमेशा कोशिश करते हैं और कल्पना करते हैं कि आपने जो सोचा है, वह काम कर जाए और आप खुद को हरमुमकिन तरीके से तैयार करते हैं. लेकिन जब भी आप किसी टूर्नामेंट में जाते हैं तो आप जानते हैं कि या तो यह बेहतर होने वाला है या कुछ अप्रत्याशित हो सकता है और यह बुरा हो जाएगा. लेकिन यह (मेक्सिको) तो सपनों सरीखा हुआ. ऐसी प्रतियोगिताएं कम ही होती हैं जो एकदम सटीक निकलें. और मेक्सिको की वजह से, मैं अगले छह साल तक चैंपियन रहा.”

यह मानते हुए कि मेक्सिको में जो हुआ उसने आने वाले वर्षों में उनके करियर को नई दिशा दी, आनंद कहते हैं कि एक मौका मिलने पर उन्होंने अपना लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित किया और अपना काम पूरा करके दिखाया. वे कहते हैं, ”मुझे इसकी गहरी इच्छा थी. इसने एक शतरंज खिलाड़ी के तौर पर मेरी विरासत को एक प्रमुख अध्याय के रूप में (2007 से 2014) में बदल दिया, भले ही यह मेरी निगाह में ऐसा न हो लेकिन दूसरे ऐसा ही मानते हैं.” वे साथ में जोड़ते हैं, एक ”बाहरी विरासत हमेशा बड़ी चीजों का रुख करती है.” वे कहते हैं, ”जब आप एक बार अपना सब कुछ काम में झोंक देते हैं तो भी यह कई दफा कामयाब नहीं होता. इसलिए उन पलों को याद करना कि जब चीजें काम कर रही थीं, बेहद खास होता है.”

किसी भी खेल में किसी भी भारतीय को वैसी बादशाहत कभी हासिल नहीं रही, जैसी आनंद ने शतरंज में हासिल की है. ऐसे में, हैरत की बात नहीं कि उन्हें देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार राजीव गांधी खेल रत्न सम्मान 1991-92 में ही हासिल हुआ और वे इस पुरस्कार को पाने वाले पहले खिलाड़ी थे. साथ ही, 2007 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण पाने वाले वे देश के पहले खिलाड़ी रहे.

आनंद जानते हैं कि विश्व चैंपियन बनने का जुनून दूसरे शानदार लम्हों पर हावी नहीं हो सकता. वे कहते हैं, ”निजी तौर पर, मेरे और अरुणा के लिए दूसरा सबसे बड़ा लम्हा हमारे बेटे अखिल का 2011 में जन्म रहा है.” वे इशारा करते हैं कि इनसानी दिमाग बड़ी घटनाओं पर केंद्रित रहता है और बाकी की चीजें भुला दी जाती हैं. वे कहते हैं, ”मैंने इसे अपनी किताब माइंड मास्टर (2019) में दर्ज करने की कोशिश की है, लेकिन अंत में मैंने बड़े मुद्दे ही शामिल किए हैं.”

COMMENTS

WORDPRESS: 0
DISQUS: 0